दिव्य संरक्षण एवं नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की अधिष्ठात्री शक्ति
माँ प्रत्यंगिरा देवी को सनातन एवं तांत्रिक परंपराओं में एक अत्यंत
प्रचंड और शक्तिशाली देवी स्वरूप के रूप में माना जाता है। उनका
स्वरूप दैवी संरक्षण, शक्ति, साहस और नकारात्मक प्रभावों
से रक्षा के भाव से जुड़ा हुआ है।
माँ प्रत्यंगिरा का स्वरूप उग्र होने के साथ-साथ भक्तों के लिए
करुणामयी और रक्षात्मक माना जाता है। उनका सिंहमुखी स्वरूप देवी
की अपार शक्ति, निर्भयता और दुष्ट शक्तियों के दमन का प्रतीक माना
जाता है। सिंह की शक्ति और देवी की दिव्य चेतना का यह स्वरूप
साधक को भय से ऊपर उठने और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा
देता है।
प्रत्यंगिरा देवी की उपासना का मूल भाव है—
दैवी संरक्षण और आत्मबल।
भक्त माँ से प्रार्थना करते हैं कि उनके जीवन से भय,
नकारात्मकता, अनिष्टकारी प्रभाव और बाधाएँ दूर हों तथा
उन्हें मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त हो।
पीताम्बरा लोक में माँ प्रत्यंगिरा देवी की
उपस्थिति धाम की त्रिशक्ति भावना को और अधिक व्यापक बनाती है।
माँ बगलामुखी जहाँ स्तम्भन एवं विजय की शक्ति का प्रतीक हैं,
वहीं माँ प्रत्यंगिरा को संरक्षण और प्रचंड रक्षाशक्ति के भाव
से स्मरण किया जाता है।
माँ प्रत्यंगिरा की आराधना साधक को यह संदेश देती है कि दिव्य
शक्ति का वास्तविक उद्देश्य धर्म की रक्षा, आत्मबल का
जागरण और जीवन में सकारात्मकता की स्थापना है।
जय माँ प्रत्यंगिरा।
माँ की कृपा से सभी भक्तों को
निर्भयता, शक्ति और संरक्षण प्राप्त हो।